मुंडागांव में हजारों पेड़ अंधाधुंध कटे, महाविनाश की गवाह बनी तस्वीरें

विकास के नाम पर विनाश का तांडव: मुंडागांव में हजारों पेड़ अंधाधुंध कटे, महाविनाश की गवाह बनी तस्वीरें

*रायगढ़।* *सुन सको तो सुन लो... आपदाएं यूं ही हमारे दरवाजों पर दस्तक देने नहीं आतीं, हम उन्हें बुलाते हैं अपने गांव, अपने शहर, अपनी बस्तियों और अपनी गलियों में बार-बार।*

बागी कलम की ये पंक्तियां आज हकीकत बनकर रायगढ़ जिले के *तमनार ब्लॉक के मुंडा (मुड़ागांव) गांव* की इन तस्वीरों में चीख रही हैं।

*विकास के नाम पर विनाश का तांडव*

*हजारों पेड़ों को अंधाधुंध काटा गया।*

ये तस्वीरें महाविनाश की भविष्यवाणी करती हैं। जहां कल तक घना जंगल था, पक्षियों का बसेरा था, आज वहां सिर्फ ठूंठ बचे हैं। मुड़ागांव 0 KM के इस बोर्ड के पास शुरू होता है वो मंजर, जो विनाश का गवाह बन गया है।

ग्रामीणों के अनुसार गारे पाल्मा सेक्टर-2 कोल ब्लॉक के लिए एक ही रात में हजारों पेड़ों को काट दिया गया। पूरा गांव विरोध करता रहा, मगर बावजूद कई हजार पेड़ काटे गए। भारी पुलिस बल की तैनाती के बीच दिन-दहाड़े जंगल उजाड़ दिया गया।

*हसदेव से मुंडागांव तक - एक ही पटकथा*

यह कहानी नई नहीं है। हसदेव अरण्य में जिस तरह 'नो-गो' क्षेत्र में भी पेड़ काटे गए, उसी तर्ज पर अब रायगढ़ के तमनार बेल्ट में भी 52 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई को सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है।

हमने कभी जंगल के जंगल काटने बंद नहीं किए। वादियों से जमीन लूटना नहीं रोका। नदियों-नालों के प्राकृतिक रास्ते संकरे कर दिए और पहाड़ों की छातियों में आज भी बारूद बांधा जा रहा है।

पर्यावरणविदों ने कई बार चेताया, हमें समझाया। तब हमने उन्हें 'अर्बन नक्सली', 'विकास विरोधी' कहा, उनकी हंसी उड़ाई।

*आज हिसाब सामने है...*
आज धरती सूखने लगी है, हवाएं गर्म हो गई हैं, जलवायु बदल गई है। नदी-तालाबों से पानी गायब है, हिमनदों से सैलाब बह रहा है और समुंदर धरती को डुबाने लगा है। हिमाचल की बाढ़, उत्तरकाशी का भूस्खलन और वायनाड की तबाही - ये प्राकृतिक आपदा नहीं, हमारी लूट का बिल है।

प्रकृति की जिस लूट को हमने 'विकास' का नाम दिया है, वास्तव में उसने अपना परिचय प्रचंड 'विनाश' के रूप में दिया है।

*सच यही है - आपदा यूं ही हमारे दरवाजे पर नहीं आई है, हमने इसे बुलाया है, हर बार की तरह इस बार भी मुंडागांव में।*

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